क्या आप जानते हैं, भारत के बँटवारे का माउंटबैटन प्लान – एक छल?
जैसा कि आप सभी जानते हैं कि भारत का जन्म विभाजन के साथ-साथ हुआ। यानि भारत के धर्म के आधार पर दो हिस्से हुए जिनमें एक था भारत एवं दूसरा पाकिस्तान जिसके पहले प्रधानमंत्री थे मुहम्मद अली जिन्ना। 14-15 अगस्त की रात एक तरफ भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू जी अपना सुप्रसिद्ध भाषण “Tryst With Destiny”(भाग्यवधू से चिर-प्रतीक्षित भेंट) लाल किले की प्राचीर से देश के नाम सूचित कर रहे थे, तो वही अहिंसा के पुजारी एवं जननेता “गांधीजी” अपने आश्रम में नींद में थे। उन्होनें आजादी का कोई जश्न नहीं मनाया। उनका तर्क भी तार्किक था, “किस बात की खुशी”? इतिहास की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि यहाँ कुछ भी अंतिम सत्य नहीं होता। हर बार कुछ न कुछ। कभी न कभी ऐसे तथ्य या तर्क सामने आ ही जाते हैं जिनसे पाठक आश्चर्यचकित रह जाते हैं जैसे कि यह तथ्य कि बँटवारे का माउंटबैटन प्लान एक छल था।
किताबों के नजरिए से बँटवारे का माउंटबैटन प्लान –
हम सभी को इसकी जानकारी है कि माउंटबैटन प्लान से ही भारत और पाकिस्तान के बीच का बँटवारा तय हुआ। पर क्या बँटवारे का माउंटबैटन प्लान एक छल था?
इस सवाल का जवाब खोजने के लिए शेखर बंधोपाध्याय की एक किताब है, जिसका नाम है, “From Plassey To Partition”. आप उस किताब को जब पढेगें, समझने का प्रयास करेगें, तो यकीनन डिस्कोर्स के मद्देनज़र कई अविश्वसनीय तथ्य आपके हाथ आयेगें।
हमारी पूरी रिसर्च में मुख्यत: चार चौंकाने वाले बिन्दु सामने आते हैं!
1.) बापू विभाजन को किसी भी कीमत पर रोकना रोकना चाहते थे, उन्होंने माउंटबैटन और एड्विना के समक्ष प्रस्ताव रखा था कि आप जिन्ना को प्रधानमंत्री बना दीजिए, एक Familiar रिश्ते की डोर सँभालने की खातिर वे उन्हें बकरी के दूध से बना दही भी चखाते हैं, मेरे विचार में यह एक तरीके की Diplomacy ही थी कि गांधी, ब्रिटिश इंडिया के अंतिम वायसराय से व्यक्तिगत संबंध स्थापित करना चाहते थे ताकि वे उससे भविष्य में कुछ बुन सके।

2.) नेहरू को जिन्ना से खासा दिक्कतें थी, आप इसे Ego-Fight भी कह सकते हैं, जिन्ना किसी भी कीमत पर अलग मुल्क पाकिस्तान को लेने बाबत् आमादा थे। वे नेहरू तो नेहरू गांधी तक की मुखालफ़त करने से नहीं चूके, नेहरू मुल्क के पहले प्रधानमंत्री का गौरव चाहते थे, तो मांटबैटन के ही शब्दों में “कांग्रेस के भीतर ही एकमत राय नहीं थी” यदि आप गौर करें तो यही से बँटवारे का माउंटबैटन प्लान एक छल इसका संकेत मिलता है। नेहरू ने गाहे-बगाहे गांधी को संकेत दे दिये थे कि वे इस बात पर नहीं झुकने वाले, वही से मुझे गांधी आश्रम की वो रात याद आती है, जिस पर बापू आजादी के उत्सव और आनंद पर कहते हैं, किस बात का उत्सव?
3.) अब मुख्य सवाल का उत्तर कि क्या बँटवारे का मांउटबैटन प्लान एक छल था? यह सवाल इसलिए कि जिस रैडक्लिफ़ लाइन का जिक्र लगातार हर बार भारत-पाकिस्तान के संबंध में होता रहा है, उस रैडक्लिफ लाइन की पटकथा तो चर्चिल और लार्ड वैवल 1945 में ही लिख चुके थे।
4.) बँटवारे का माउंटबैटन प्लान एक छल इसे कहने के पीछे एक बहुत जरूरी तथ्य यह है कि ब्रिटिशर्स ने पहले अपना आर्थिक लाभ देखा, स्टालिन को एक गरम पानी वाले बन्दरगाह की जरूरत थी, और ब्रिटिशर्स किसी भी कीमत पर खाड़ी देशों के मद्देनज़र अपनी पकड़ कमजोर नहीं करना चाहते थे, तो उन्होंने जिन्ना की जिद को चुपचाप मूक समर्थन दिया क्योंकि अब कराँची बन्दरगाह सोवियत संघ के कब्जे से बाहर था।
निष्कर्ष –
कुलजमा अब निष्कर्ष की बारी है कि क्या बँटवारे का माउंटबैटन प्लान एक छल था? ये नाटक ब्रिटिशर्स क्यों करना चाहते थे? क्या माउंटबैटन को विभाजन का दोषी ठहराना चाहिए। जबकि वे बेहद साफ़गोई से नेहरू से कहते हैं कि मैं हिन्दुस्तान को आजादी दिलाना चाहता हूँ। जितना शांतिपूर्वक उतना अच्छा, वही रैडक्लिफ कहते हैं कि मेरा जमीर कहता है कि मैं आपसे इस काम की फीस न लूँ। साथ ही बँटवारे का माउंटबैटन प्लान एक छल था इसकी गहराई में जाने के लिए आप गुरिंदर चड्डा” द्वारा निर्देशित “Partition-1947” फिल्म को जरूर देखिए वही से इस तथ्य को और ज्यादा मजबूती मिलती है!!
अंत में लाॅर्ड माउंटबैटन के ही शब्दों में –
“नए मुल्क कभी अमन में पैदा नहीं होते”!!
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